8 नवंबर को देशभर में दीपावली मनाई जाएगी। घर-घर में दीप जलेंगे और रात को माता लक्ष्मी का पूजन होगा। लेकिन क्या आपने सोचा है कि कार्तिक अमावस्या की इस अंधेरी रात में ही लक्ष्मी पूजन क्यों होता है? इसके पीछे वैदिक परंपरा और पुराणों की एक रोचक कथा जुड़ी है, जो राजा बलि और भगवान वामन से संबंधित है।
अंधकार पर प्रकाश का वैदिक भाव
वैदिक परंपरा में 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' यानी अंधकार से प्रकाश की ओर चलने की प्रार्थना है। अमावस्या की सबसे अंधेरी रात में दीप जलाना इसी भाव का प्रतीक है। लक्ष्मी केवल धन की नहीं, बल्कि समृद्धि, शुभता, स्वच्छता और सद्गुणों की देवी मानी जाती हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि जहां स्वच्छता, परिश्रम और सदाचार होता है, वहीं लक्ष्मी का वास होता है। इसीलिए दिवाली से पहले घरों की सफाई और सजावट की परंपरा है।
राजा बलि और 'बलिराज्य' की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, दानवीर असुर राजा बलि ने अपने पराक्रम से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। तब भगवान विष्णु वामन रूप में उनके पास पहुंचे और तीन पग भूमि मांगी। बलि ने वचन दे दिया। वामन ने दो पग में धरती और आकाश नाप लिए और तीसरे पग के लिए बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। उनकी दानशीलता से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें पाताल लोक का राज्य दिया और वर मांगने को कहा। मान्यता है कि बलि ने वर मांगा कि जो लोग इन दिनों दीपदान करें, उनके घर में लक्ष्मी स्थायी रूप से निवास करें। पद्म पुराण और स्कंद पुराण से जुड़ी परंपराओं में इन दिनों को 'बलिराज्य' कहा गया है। दिवाली के अगले दिन 'बलि प्रतिपदा' मनाई जाती है, खासकर महाराष्ट्र और कर्नाटक में।
संतों का संदेश
संत आसाराम बापू आश्रम (ashram.org) समेत कई आध्यात्मिक संस्थाएं दीपावली को सात्विक ढंग से, दीपदान, सत्संग, जप और सेवा के साथ मनाने का संदेश देती हैं। उनका कहना है कि बाहर के दीयों के साथ भीतर का ज्ञान रूपी दीप जलाना ही दिवाली का असली अर्थ है।
- दीपावली: 8 नवंबर, कार्तिक अमावस्या
- लक्ष्मी पूजन: प्रदोष काल में
- कथा: वामन अवतार और राजा बलि
- अगला दिन: बलि प्रतिपदा / गोवर्धन पूजा
इस दिवाली जब आप दीप जलाएं, तो याद रखें कि यह पर्व केवल धन का नहीं, बल्कि दान, त्याग और प्रकाश का उत्सव है।